Love is the beauty of the soul
Beauty of Soul: आत्मा की सौंदर्य-सरसता का तात्पर्य कोमलता, मधुरता, आर्द्रता से
Love is the beauty of the soul : सरसता हृदय का शृंगार, ईश्वर का वरदान है। सहृदय मानव को ईश्वरीय गुणों से लबालब होते देखा गया है। सरस बनिए, सरसता का अभिप्राय कोमलता, मधुरता, आद्र्रता है। सहृदय व्यक्ति पर- दुःखकातर होता है। दूसरों के दुःखों को बंटाने में वह ईश्वरीय आनंद का अनुभव करता है, जिनके हृदय नीरस हैं, वे स्वयं और परिवार को ही नहीं अपने संपर्क में आने वाले हर प्राणी को दुःख प्रदान करते हैं।
रस की बरसा सूखी धरती को भी हरियाली से भर देती है, फिर स्नेह जल से सींचे गए प्राणी आनंद से सराबोर क्यों नहीं हो सकते? गुरुदेव कहते हैं- जिसने अपनी विचारधाराओं और भावनाओं को शुष्क, नीरस और कठोर बना रखा है, उसने अपने आनंद, प्रफुल्लता और प्रसन्नता के भंडार को बंद कर रखा है। वह जीवन का सच्चा रस प्राप्त करने से वंचित रहेगा, आनंद-स्रोत सरसता की अनुभूतियों में है।
सरस भावनाएं विकसित करें
परमात्मा को आनंदमय बताया गया है। श्रुति कहती है- रसो वै सः अर्थात् परमात्मा रसमय है। वह अपनी सरसता से सृष्टि का सिंचन करता है। हमारा भी यह स्वभाव बने कि हम अपने सरस आचार-विचार और व्यवहार से सृष्टा के इस उपवन को सिंचित कर उसे आनंद प्रदान कर सकें। रस-रूप परमात्मा को इस विशाल परिवार में प्रतिष्ठित करने के लिए लचीली, कोमल, स्निग्ध और सरस भावनाएं विकसित करनी चाहिए।
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