Lucknow Poster case government can appeal to supreme court

लखनऊ पोस्टर मामले में योगी सरकार ने की उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिए थे सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के पोस्टर हटाने के आदेश
  • उच्च अदालत ने कहा कि प्रशासन की कार्रवाई लोगों की निजता का हनन
  • कानूनी प्रावधान के बगैर ऐसे पोस्टर नहीं लगाने के आदेश
नई दिल्ली, 11 मार्च, (एजेंसी) उत्तर प्रदेश सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुयी हिंसा और तोड़फोड़ के आरोपियों के पोस्टर हटाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ बुधवार को शीर्ष अदालत में अपील दायर की।
उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च अदालत ने नौ मार्च को लखनऊ प्रशासन को यह आदेश दिया था। कि नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ के आरोपियों के जो पोस्टर लगाए गए हैं उन्हें हटाया जाए।  उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता राघवेन्द्र सिंह ने बताया कि राज्य सरकार की इस अपील पर बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति उदय यू ललित और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की अवकाशकालीन पीठ सुनवाई करेगी। हालांकि, राघवेन्द्र सिंह ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर अपील के आधार की जानकारी देने से इंकार कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया था कि कानूनी प्रावधान के बगैर ऐसे पोस्टर नहीं लगाये जायें।

अदालत ने आरोपियों के नाम और फोटो के साथ लखनऊ में सड़क किनारे लगाये गये इन पोस्टरों को तुरंत हटाने का निर्देश देते हुये टिप्पणी की थी कि पुलिस की यह कार्रवाई जनता की निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप है।
अदालत ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस आयुक्त को 16 मार्च या इससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया था। इन पोस्टरों को लगाने का मकसद प्रदेश की राजधानी में 19 दिसंबर को आयोजित नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को कथित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले आरोपियों को शर्मसार करना था। इन पोस्टरों में प्रकाशित नामों और तस्वीरों में सामाजिक कार्यकर्ता एवं नेता सदफ जाफर, और पूर्व आईपीएस अधिकारी एस आर दारापुरी के नाम भी शामिल थे। ये पोस्टर लखनऊ के प्रमुख चौराहों पर लगाये गये हैं। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में टिप्पणी की थी कि प्राधिकारियों की इस कार्रवाई से संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकार का हनन होता है।
इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा प्रतिपादित प्रक्रिया का पालन किये बगैर उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता और जीने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस जनहित याचिका की विषय वस्तु को लेकर उसे इसमें संदेह नहीं कि सरकार की कार्रवाई और कुछ नहीं बल्कि जनता की निजता में अनावश्यक हस्तक्षेप है।

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